उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में इस बार दलित राजनीति का नया समीकरण देखने को मिल सकता है। बसपा के पारंपरिक दलित वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश के तहत प्रमुख राजनीतिक दल बड़ी संख्या में सामान्य (अनारक्षित) सीटों पर भी दलित उम्मीदवार उतारने की रणनीति बना रहे हैं। माना जा रहा है कि इससे दलित नेतृत्व की भूमिका सुरक्षित सीटों तक सीमित नहीं रहेगी।
सूत्रों के अनुसार, लोकसभा चुनाव में अयोध्या सीट से दलित उम्मीदवार अवधेश प्रसाद की जीत के बाद समाजवादी पार्टी इस रणनीति को विधानसभा चुनाव में भी आगे बढ़ाने की तैयारी कर रही है। पार्टी पश्चिमी उत्तर प्रदेश और अवध क्षेत्र की कई सामान्य सीटों पर दलित उम्मीदवार उतारने की योजना बना रही है, जहां यादव, मुस्लिम और दलित वोटों का समीकरण निर्णायक माना जाता है।
सपा की रणनीति को देखते हुए भाजपा ने भी अपनी चुनावी तैयारी तेज कर दी है। पार्टी ऐसी सामान्य सीटों की पहचान कर रही है, जहां उसके पारंपरिक वोट बैंक के साथ दलित मतदाताओं की संख्या भी प्रभावी है। भाजपा का लक्ष्य अगड़े, अति पिछड़े और दलित वोटों के गठजोड़ के जरिए मजबूत चुनावी बढ़त हासिल करना है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बसपा के लगातार कमजोर होते जनाधार के कारण उसका पारंपरिक दलित वोट बैंक अब अन्य दलों के लिए बड़ा राजनीतिक लक्ष्य बन गया है। यही वजह है कि भाजपा और सपा दोनों जाटव और गैर-जाटव दलित मतदाताओं को अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रहे हैं।
उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में 84 सीटें अनुसूचित जाति (SC) और दो सीटें अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित हैं। हालांकि इस बार सामान्य सीटों पर भी दलित उम्मीदवारों की संख्या बढ़ने की संभावना जताई जा रही है, जिससे विधानसभा में दलित प्रतिनिधित्व बढ़ सकता है और राज्य की राजनीति के समीकरण बदल सकते हैं।
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