असम राइफल्स के वारंट ऑफिसर बलवंत सिंह खेतवाल की शहादत से हल्द्वानी समेत पूरे उत्तराखंड में शोक की लहर है। लालकुआं कोतवाली क्षेत्र की कर्नल फार्म स्थित जगदंबा कॉलोनी में उनके घर के बाहर लोगों की भीड़ जुटी है। परिवार और स्थानीय लोग शहीद के पार्थिव शरीर की अंतिम घर वापसी का इंतजार कर रहे हैं। उनका पार्थिव शरीर बुधवार शाम तक हल्द्वानी पहुंचने की संभावना है, जबकि गुरुवार को पूरे सैन्य सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया जाएगा।
घर के भीतर पत्नी संगीता देवी पति की तस्वीर थामे खामोश बैठी हैं। उनके साथ बेटा और दोनों बेटियां भी नम आंखों से अपने पिता की अंतिम विदाई का इंतजार कर रहे हैं। परिवार का हर सदस्य उस पल की राह देख रहा है, जब उनका वीर सपूत तिरंगे में लिपटकर आखिरी बार घर लौटेगा।
बच्चों की पढ़ाई के लिए बनाया था हल्द्वानी में घर
बागेश्वर जिले के तुपेड (वन डूंगरा) गांव के मूल निवासी बलवंत सिंह खेतवाल वर्ष 1991 में असम राइफल्स में भर्ती हुए थे। बच्चों की बेहतर शिक्षा के लिए उन्होंने करीब 10 साल पहले हल्द्वानी में घर बनाया था। परिवार में पत्नी, दो बेटियां और एक बेटा हैं। बड़ी बेटी की शादी हो चुकी है, छोटी बेटी देहरादून में बीकॉम की पढ़ाई कर रही है, जबकि बेटा हाईस्कूल का छात्र है।
‘अगस्त-सितंबर में फिर घर आऊंगा’ कहकर गए थे
पत्नी संगीता देवी ने बताया कि मार्च में छुट्टी पर घर आए बलवंत सिंह 2 अप्रैल को ड्यूटी पर लौटे थे। जाते समय उन्होंने कहा था कि अगस्त-सितंबर में फिर घर आएंगे। आखिरी बार फोन पर भी उन्होंने बच्चों की पढ़ाई और परिवार का हालचाल पूछा था। बातचीत के दौरान उन्होंने किसी खतरे या तनाव का जिक्र नहीं किया था।
मणिपुर में उग्रवादियों के हमले में हुए शहीद
26 जुलाई को मणिपुर के उखरुल जिले के नुंगशांग खोंग इलाके में 40 असम राइफल्स के काफिले पर संदिग्ध उग्रवादियों ने घात लगाकर हमला कर दिया। पहले आईईडी विस्फोट किया गया, इसके बाद अंधाधुंध फायरिंग हुई। इस हमले में वारंट ऑफिसर बलवंत सिंह खेतवाल और पौड़ी गढ़वाल निवासी हवलदार चंद्रमोहन सिंह शहीद हो गए।
पूरे इलाके में शोक और गर्व का माहौल
शहीद के घर के बाहर बड़ी संख्या में लोग श्रद्धांजलि देने पहुंच रहे हैं। स्थानीय लोगों ने आतंकियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है। इम्फाल में मुख्यमंत्री और राज्यपाल ने दोनों शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करने के बाद उनके पार्थिव शरीर उत्तराखंड के लिए रवाना किए। देर शाम तक उनके घर पहुंचने की उम्मीद है।
आज हल्द्वानी का एक परिवार ही नहीं, बल्कि पूरा उत्तराखंड अपने वीर सपूत की अंतिम घर वापसी का इंतजार कर रहा है। आंखों में आंसू हैं, लेकिन उस बलिदान पर गर्व भी है, जिसने देश की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया।
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