दिल्ली सरकार ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के समक्ष राजधानी में कचरा प्रबंधन और यमुना प्रदूषण को लेकर प्रगति रिपोर्ट पेश की है। रिपोर्ट में स्वीकार किया गया है कि दिल्ली में अब भी प्रतिदिन 4,659 टन ठोस कचरे का वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण नहीं हो पा रहा, जबकि बिना उपचार का सीवेज यमुना नदी में पहुंचकर प्रदूषण बढ़ा रहा है।
पर्यावरण विभाग के अनुसार, दिल्ली में प्रतिदिन 12,862 टन ठोस कचरा उत्पन्न होता है। इनमें से 7,841 टन (करीब 63 फीसदी) कचरे का ही निस्तारण हो रहा है, जबकि 37 फीसदी कचरा बिना प्रोसेसिंग के रह जाता है। राजधानी के कुल कचरे में सबसे बड़ा हिस्सा एमसीडी क्षेत्र से आता है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि दिल्ली में रोजाना 3,636 एमएलडी सीवेज पैदा होता है। दिल्ली जल बोर्ड के पास 37 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) हैं, लेकिन इसके बावजूद करीब 249 एमएलडी सीवेज बिना उपचार के यमुना में पहुंच रहा है, जो नदी प्रदूषण का प्रमुख कारण बना हुआ है।
सरकार ने वर्ष 2028 तक सीवेज शोधन क्षमता बढ़ाने और कचरा प्रबंधन को मजबूत करने का लक्ष्य तय किया है। इसके तहत नए एसटीपी स्थापित किए जाएंगे और मौजूदा संयंत्रों की क्षमता बढ़ाई जाएगी। साथ ही, 7,650 टन प्रतिदिन अतिरिक्त क्षमता विकसित करने के लिए छह बड़े कचरा प्रबंधन प्रोजेक्ट शुरू किए गए हैं। इनमें नरेला-बवाना और गाजीपुर में नए वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट, ओखला और तेहखंड संयंत्रों का विस्तार तथा बायो-सीएनजी और बायोगैस प्लांट की स्थापना भी शामिल है।
सरकार का दावा है कि इन परियोजनाओं के पूरा होने के बाद राजधानी में कचरा निस्तारण और यमुना प्रदूषण की समस्या पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकेगा।
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