11 सितंबर 2001 का दिन अमेरिका और पूरी दुनिया के इतिहास में एक भयावह मोड़ साबित हुआ। आतंकियों ने चार विमानों को हाईजैक कर अमेरिका के अहम ठिकानों को निशाना बनाया। दो विमान न्यूयॉर्क स्थित वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की ट्विन टावर से टकराए, जबकि एक विमान पेंटागन से जा टकराया। चौथा विमान पेंसिल्वेनिया में दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इस हमले में हजारों लोगों की जान गई।
इस हमले के 25 साल बाद भी 9/11 की त्रासदी दुनिया की सुरक्षा व्यवस्था और आतंकवाद के खिलाफ रणनीति पर गहरा असर छोड़ती है। हमले के बाद अमेरिका ने अपने सुरक्षा और खुफिया तंत्र में बड़े बदलाव किए। एयरपोर्ट सुरक्षा से लेकर आतंकवाद की फंडिंग रोकने और अंतरराष्ट्रीय खुफिया सहयोग तक कई स्तरों पर नई व्यवस्था लागू की गई।
9/11 के बाद अमेरिका ने किए बड़े बदलाव
हमले के बाद अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ व्यापक अभियान शुरू किया, जिसे ‘ग्लोबल वॉर ऑन टेरर’ कहा गया। इसके तहत आतंकियों के सुरक्षित ठिकानों को खत्म करने, उनकी आर्थिक मदद रोकने और सैन्य कार्रवाई करने पर जोर दिया गया।
अमेरिका ने 7 अक्तूबर 2001 को अफगानिस्तान में सैन्य अभियान शुरू किया। इसके बाद 2003 में इराक में भी सैन्य कार्रवाई की गई।
होमलैंड सिक्योरिटी विभाग का गठन
9/11 के बाद अमेरिका ने अपनी आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव करते हुए होमलैंड सिक्योरिटी विभाग (DHS) बनाया। 25 नवंबर 2002 को होमलैंड सिक्योरिटी एक्ट के तहत इसकी स्थापना हुई और मार्च 2003 में इसने काम शुरू किया।
इस विभाग का उद्देश्य अलग-अलग सुरक्षा एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल बनाना और आतंकवाद समेत दूसरे सुरक्षा खतरों से निपटना था। इसके लिए 22 एजेंसियों और कार्यालयों को एक कैबिनेट स्तर के विभाग के तहत लाया गया।
पेट्रियट एक्ट से बढ़े जांच एजेंसियों के अधिकार
26 अक्तूबर 2001 को अमेरिका ने यूएसए पेट्रियट एक्ट लागू किया। इसके तहत आतंकवाद की जांच और रोकथाम के लिए सुरक्षा एवं जांच एजेंसियों को अतिरिक्त अधिकार दिए गए।
कानून ने खुफिया जानकारी जुटाने और अलग-अलग एजेंसियों के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान को आसान बनाया। आतंकवाद की फंडिंग और मनी लॉन्ड्रिंग पर रोक लगाने के लिए भी प्रावधान किए गए।
हालांकि, निगरानी के बढ़े अधिकारों को लेकर अमेरिका में नागरिक स्वतंत्रता और निजता से जुड़े सवाल भी उठते रहे।
एयरपोर्ट सुरक्षा हुई और सख्त
9/11 के बाद हवाई यात्रा की सुरक्षा में भी बड़ा बदलाव आया। ट्रांसपोर्टेशन सिक्योरिटी एडमिनिस्ट्रेशन (TSA) की स्थापना की गई और एयरपोर्ट सुरक्षा जांच को संघीय निगरानी में लाया गया।
यात्रियों और सामान की स्क्रीनिंग को सख्त किया गया। विस्फोटक और हथियारों का पता लगाने वाली तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाया गया। चेक-इन सामान की स्क्रीनिंग पर भी विशेष जोर दिया गया। विमानों के कॉकपिट के दरवाजों को अधिक सुरक्षित बनाने के निर्देश दिए गए।
खुफिया एजेंसियों के बीच बढ़ा सहयोग
अमेरिका ने आतंकवाद से निपटने के लिए दूसरे देशों के साथ खुफिया जानकारी साझा करने की व्यवस्था को भी मजबूत किया। मकसद था कि संभावित आतंकी साजिश या आतंकियों की गतिविधियों से जुड़ी जानकारी समय रहते संबंधित एजेंसियों तक पहुंच सके।
नाटो ने भी 9/11 के बाद आतंकवादी खतरों से जुड़ी सूचनाओं के विश्लेषण और साझा करने पर जोर दिया।
भारत के लिए क्या है सीख?
9/11 के अनुभव से भारत के लिए भी कई महत्वपूर्ण सबक सामने आते हैं। आतंकवाद से निपटने के लिए केवल हमले के बाद कार्रवाई करने के बजाय पहले से खतरे की पहचान और रोकथाम पर जोर देना जरूरी है।
खुफिया एजेंसियों के बीच रियल-टाइम सूचना साझा करने, केंद्र और राज्यों की सुरक्षा एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल, आतंकियों की फंडिंग पर नजर और ऑनलाइन कट्टरपंथ को रोकने की दिशा में लगातार काम करने की जरूरत है।
भारत में पिछले वर्षों में पठानकोट, उरी, पुलवामा, राजौरी और पहलगाम जैसी आतंकी घटनाएं सुरक्षा व्यवस्था के सामने चुनौती पेश करती रही हैं। ऐसे में 9/11 के बाद अमेरिका द्वारा किए गए सुरक्षा सुधार भारत के लिए भी महत्वपूर्ण अनुभव और सीख प्रदान करते हैं।
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