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13 साल की उम्र में घर छोड़कर निकले संत प्रेमानंद, काशी में क्या हुआ जिसने बदल दी जीवन की दिशा?

संत प्रेमानंद महाराज ने अपने जीवन से जुड़े आध्यात्मिक अनुभवों को लेकर एक सत्संग में विस्तार से बात की। एक भक्त के सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने बताया कि उन्होंने महज 13 वर्ष की उम्र में घर छोड़ दिया था। इसके बाद उनका जीवन साधना, सत्संग और भगवान के नाम के जाप में बीतने लगा।

संत प्रेमानंद के अनुसार, काशी में साधना के दौरान उन्हें भगवान शिव के साकार रूप के साक्षात्कार की अनुभूति हुई। उन्होंने बताया कि उस समय उनके मन में भगवान शिव के प्रत्यक्ष दर्शन की प्रबल इच्छा थी। उनके मुताबिक, भक्त जिस भावना से भगवान को याद करता है, उसी भावना के अनुरूप उसे आध्यात्मिक अनुभूति हो सकती है।

13 साल की उम्र में छोड़ा था घर

संत प्रेमानंद ने बताया कि जब उन्होंने घर छोड़ा, तब उनकी उम्र सिर्फ 13 वर्ष थी। इसके बाद उन्होंने सांसारिक जीवन से दूरी बनाकर साधना और सत्संग को अपने जीवन का आधार बनाया। उन्होंने कहा कि वह अकेले रहे और बड़े महापुरुषों का संग किया।

उनके मुताबिक, शुरुआत से ही उन्हें यह अनुभूति होती रही कि भगवान उनके साथ हैं। इसी विश्वास के साथ उन्होंने अपना जीवन आध्यात्मिक साधना में आगे बढ़ाया।

काशी में हुई विशेष अनुभूति

संत प्रेमानंद ने बताया कि काशी के घाटों पर उन्हें भगवान शिव के साकार रूप के साक्षात्कार की अनुभूति हुई। उन्होंने कहा कि उनके मन में भगवान शिव के प्रत्यक्ष दर्शन की इच्छा थी और इसी भावना के साथ वह लगातार भगवान का नाम जपते रहे।

उन्होंने बताया कि कई-कई दिन तक उन्हें भोजन की भी चिंता नहीं रहती थी। उनका पूरा ध्यान भगवान के नाम और दर्शन की लगन में लगा रहता था। उनके अनुसार, उस समय मन में यही भाव रहता था कि आज भगवान के दर्शन हो जाएंगे।

संत ने कहा कि उनके जीवन में कई आध्यात्मिक अनुभूतियां हुईं, लेकिन काशी का अनुभव उनके लिए विशेष रहा। उन्होंने यह भी बताया कि उन्हें उस अनुभव की सटीक तारीख या दिन याद नहीं है, क्योंकि उन्होंने अपने जीवन में घड़ी और मोबाइल जैसी चीजों को नहीं रखा।

काशी के बाद वृंदावन की ओर बढ़ा जीवन

संत प्रेमानंद के मुताबिक, काशी की साधना पूरी होने के बाद उनका जीवन वृंदावन की ओर आगे बढ़ा। उन्होंने कहा कि भगवान ने उन्हें वृंदावन के कार्य के लिए भेजा। आज भी उन्हें ऐसा अनुभव होता है कि भगवान उन्हें अपनी गोद में लिए हुए हैं और उनका दुलार बचपन से ही उन्हें मिलता रहा है।

उन्होंने कहा कि उनका पूरा जीवन इन्हीं आध्यात्मिक अनुभूतियों के बीच आगे बढ़ता रहा है और हर समय आनंद की अनुभूति बनी रहती है।

नामजप को बताया दुख से बचने का आधार

सत्संग के दौरान एक भक्त के सवाल का जवाब देते हुए संत प्रेमानंद ने नामजप के महत्व पर भी बात की। उन्होंने कहा कि जब भगवान का नाम भक्त के हृदय की गहराई में लगातार चलता रहता है तो सांसारिक दुख उसी तरह भीतर प्रवेश नहीं कर पाता।

उन्होंने भक्तों से जीवन में भगवान के नाम को हमेशा साथ रखने की बात कही। उनके अनुसार, सांसारिक प्रपंच में उलझने के कारण व्यक्ति को गहरे दुख का सामना करना पड़ता है, जबकि भगवान का स्मरण मन को स्थिर रखने में सहायक होता है।

भगवान के ध्यान पर कही यह बात

संत प्रेमानंद ने कहा कि भगवान का ध्यान करने से मन के भीतर एक ऐसी स्थिति बनती है, जिसमें बाहरी दुख आसानी से प्रभावित नहीं कर पाते। उन्होंने कहा कि व्यक्ति के दुखों का संबंध उसके कर्मों से भी होता है और भगवान का स्मरण उसे आध्यात्मिक रूप से मजबूत बनाता है।

उन्होंने भक्तों को पाप कर्मों से दूर रहने और भगवान का निरंतर स्मरण करने की सलाह दी। उनके अनुसार, जीवन में भगवान के नाम को आधार बनाने से व्यक्ति को आंतरिक शांति और आनंद की अनुभूति हो सकती है।

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