अमेरिका में H-1B वीजा कार्यक्रम को लेकर सख्ती की तैयारी तेज हो गई है। अमेरिकी सीनेट में रिपब्लिकन सांसद टिम शीही ने एक विधेयक पेश किया है, जिसमें नए H-1B वीजा जारी करने पर तीन साल तक रोक लगाने और प्रत्येक आवेदन पर 1 लाख अमेरिकी डॉलर शुल्क को कानूनी मान्यता देने का प्रस्ताव रखा गया है। यदि यह विधेयक कानून बनता है तो इसका सबसे बड़ा असर भारतीय आईटी पेशेवरों और अमेरिकी टेक कंपनियों पर पड़ सकता है।
मोंटाना से सीनेटर टिम शीही का कहना है कि H-1B कार्यक्रम का उद्देश्य केवल विशेष कौशल वाले कर्मचारियों की कमी को पूरा करना था, लेकिन इसका इस्तेमाल सस्ते विदेशी श्रमिकों के जरिए अमेरिकी कर्मचारियों की जगह भरने के लिए किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित कानून इस व्यवस्था में मौजूद खामियों को दूर करेगा, सुरक्षा मानकों को मजबूत बनाएगा और राष्ट्रीय हितों की रक्षा करेगा।
H-1B वीजा के जरिए अमेरिकी कंपनियां इंजीनियर, सॉफ्टवेयर डेवलपर, डेटा साइंटिस्ट और अन्य तकनीकी विशेषज्ञों को विदेशों से नियुक्त करती हैं। भारत और चीन इस वीजा के सबसे बड़े लाभार्थी देशों में शामिल हैं। हर साल हजारों भारतीय पेशेवर इसी वीजा के माध्यम से अमेरिका में रोजगार हासिल करते हैं।
प्रस्तावित विधेयक को इमिग्रेशन अकाउंटेबिलिटी प्रोजेक्ट और फेडरेशन फॉर अमेरिकन इमिग्रेशन रिफॉर्म (FAIR) का समर्थन मिला है। इसमें तीन साल तक नए H-1B वीजा पर रोक लगाने के बाद कार्यक्रम को अधिक सख्त नियमों और सीमाओं के साथ दोबारा शुरू करने का सुझाव दिया गया है। साथ ही, ट्रंप प्रशासन द्वारा H-1B आवेदनों पर लगाए गए 1 लाख अमेरिकी डॉलर के शुल्क को कानून का हिस्सा बनाने की मांग भी शामिल है।
हालांकि, यह फिलहाल केवल एक प्रस्तावित विधेयक है। इसे कानून बनने के लिए अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों से पारित होकर राष्ट्रपति की मंजूरी मिलना आवश्यक होगा। तब तक H-1B वीजा कार्यक्रम में कोई तत्काल बदलाव लागू नहीं होगा।
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