उत्तर प्रदेश की बहुचर्चित 69,000 शिक्षक भर्ती मामले में राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में नया हलफनामा दाखिल करते हुए अपना पक्ष स्पष्ट किया है। सरकार ने अदालत से कहा है कि संशोधित मेरिट सूची में स्थान पाने वाले पात्र अभ्यर्थियों का समायोजन पहले से नियुक्त शिक्षकों के हितों को प्रभावित किए बिना किया जा सकता है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई मंगलवार, 28 जुलाई को निर्धारित है।
सरकार की ओर से दाखिल चार पृष्ठों के हलफनामे में 20 जुलाई को प्रस्तुत किए गए शपथपत्र का भी उल्लेख किया गया है। इसमें कहा गया है कि संशोधित मेरिट सूची के आधार पर पात्र अभ्यर्थियों को उपलब्ध रिक्त पदों पर समायोजित करने की व्यवस्था की जा सकती है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि केवल वही अभ्यर्थी इस प्रक्रिया के पात्र होंगे, जो निर्धारित शैक्षणिक और अन्य आवश्यक योग्यताओं को पूरा करते हैं।
हलफनामे में सरकार ने यह भी कहा है कि इस व्यवस्था को भविष्य के मामलों में मिसाल (नजीर) के रूप में नहीं माना जाना चाहिए। राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को भरोसा दिलाया कि इस मामले में अदालत जो भी अंतिम निर्देश जारी करेगी, उसका पूरी तरह पालन किया जाएगा।
दूसरी ओर, आरक्षण से प्रभावित अभ्यर्थियों ने सरकार के इस रुख पर असंतोष जताया है। उनका कहना है कि भर्ती प्रक्रिया में आरक्षण से जुड़े विवाद का समाधान केवल समायोजन से नहीं होगा। उनका आग्रह है कि सभी आरक्षण प्रभावित याचिकाकर्ताओं को न्यायिक लाभ दिया जाए और भर्ती की मूल चयन सूची सार्वजनिक की जाए, ताकि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी हो सके।
पिछड़ा दलित संयुक्त मोर्चा के पदाधिकारियों ने आरोप लगाया कि भर्ती प्रक्रिया में आरक्षण नियमों का सही तरीके से पालन नहीं किया गया। संगठन का कहना है कि यदि सरकार नियुक्त शिक्षकों को बनाए रखना चाहती है, तो आरक्षण से प्रभावित अभ्यर्थियों के अधिकारों की भी समान रूप से रक्षा की जानी चाहिए।
अब इस पूरे मामले पर सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट की 28 जुलाई को होने वाली सुनवाई पर है। माना जा रहा है कि अदालत की आगामी टिप्पणी और निर्देश भर्ती प्रक्रिया से जुड़े हजारों अभ्यर्थियों के भविष्य पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकते हैं।
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