आयकर विभाग ने टैक्स बचाने के लिए गलत प्रावधानों का इस्तेमाल करने वाले करदाताओं पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। विभाग के आधुनिक डेटा एनालिटिक्स सिस्टम ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए अब तक करीब 20 हजार संदिग्ध मामलों की पहचान की है, जिनमें करदाताओं ने टैक्स देनदारी कम करने के लिए कथित तौर पर गलत धाराओं और फर्जी टैक्स छूट का सहारा लिया है।
आयकर विभाग के अनुसार, कई मामलों में करदाताओं ने एक धारा में मिलने वाली छूट को दूसरी धारा में दिखाकर टैक्स बचाने की कोशिश की। इस प्रक्रिया को विभाग तकनीकी रूप से ‘स्वैप्ड प्रोविजन्स’ कहता है। हालांकि, आयकर कानून में इस शब्द का कोई कानूनी उल्लेख नहीं है, लेकिन इसका इस्तेमाल उन मामलों के लिए किया जाता है, जहां पात्रता या दस्तावेजों के बिना गलत धारा के तहत टैक्स छूट का दावा किया जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, कुछ करदाता एक ही निवेश या खर्च को अलग-अलग धाराओं में दिखाकर दोहरी टैक्स छूट लेने का प्रयास करते हैं, जबकि कुछ लोग ऐसे खर्चों पर भी टैक्स लाभ का दावा कर देते हैं, जिनकी उन्हें कानूनी अनुमति नहीं होती। इस तरह की गलतियां टैक्स प्लानिंग नहीं, बल्कि नियमों के उल्लंघन की श्रेणी में आ सकती हैं।
अब आयकर विभाग कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और डेटा एनालिटिक्स की मदद से करदाताओं की ओर से दाखिल आईटीआर का AIS (Annual Information Statement), Form 26AS, Form-16, TDS रिकॉर्ड और बैंकों की हाई-वैल्यू ट्रांजैक्शन रिपोर्ट (SFT) से मिलान करता है। किसी भी तरह की विसंगति सामने आने पर सिस्टम स्वतः अलर्ट जारी कर देता है, जिसके बाद करदाता को नोटिस, अतिरिक्त टैक्स, ब्याज और स्क्रूटनी जैसी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।
विशेषज्ञों की सलाह है कि यदि किसी करदाता को रिटर्न दाखिल करने के बाद अपनी गलती का पता चलता है, तो वह संशोधन (Revised ITR) की निर्धारित अवधि के भीतर सही जानकारी के साथ रिटर्न अपडेट कर सकता है। यदि विभाग की ओर से नोटिस जारी हो चुका है, तो तय समय सीमा के भीतर सभी जरूरी दस्तावेजों के साथ जवाब देना और आवश्यक अतिरिक्त टैक्स व ब्याज का भुगतान करना बेहतर विकल्प माना जाता है।
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