भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और केंद्र सरकार की ओर से जून में घोषित नीतिगत उपायों से भारत के भुगतान संतुलन (Balance of Payments) में उल्लेखनीय सुधार आने की संभावना है। एचडीएफसी म्यूचुअल फंड की जुलाई रिपोर्ट के अनुसार, इन कदमों के चलते लगातार तीसरे साल संभावित भुगतान संतुलन घाटा छोटे अधिशेष (सरप्लस) में बदल सकता है, जिससे रुपये पर पड़ रहा दबाव भी कम होगा।
रिपोर्ट में कहा गया है कि आरबीआई और सरकार की पहलों से देश में विदेशी पूंजी प्रवाह बढ़ने की उम्मीद है। इससे भारत की बाहरी आर्थिक स्थिति मजबूत होगी और रुपये को भी सहारा मिलेगा। आरबीआई ने 30 सितंबर 2026 तक तीन से पांच वर्ष की नई FCNR(B) जमा योजनाओं पर पूरी हेजिंग लागत वहन करने का फैसला किया है। इस योजना से 40 से 60 अरब डॉलर तक का संभावित पूंजी प्रवाह आकर्षित होने का अनुमान है। 17 जुलाई 2026 तक इस माध्यम से करीब 17 अरब डॉलर का निवेश आ चुका है।
इसके अलावा, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU) के बाहरी वाणिज्यिक उधार (ECB) के लिए रियायती विदेशी मुद्रा स्वैप सुविधा भी शुरू की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस कदम से 15 से 25 अरब डॉलर तक का अतिरिक्त विदेशी निवेश आने की संभावना है, जबकि उधार लेने की हेजिंग लागत भी कम होगी।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सरकार ने सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश से होने वाले पूंजीगत लाभ और विदहोल्डिंग टैक्स को हटाने का निर्णय लिया है। इससे भारतीय सरकारी बॉन्ड के ब्लूमबर्ग बॉन्ड इंडेक्स में शामिल होने की संभावना बढ़ेगी। यदि ऐसा होता है, तो अगले 12 से 18 महीनों में 10 से 20 अरब डॉलर तक का अतिरिक्त विदेशी निवेश भारत आ सकता है।
एचडीएफसी म्यूचुअल फंड के अनुसार, पिछले 12 से 18 महीनों में रुपये पर दबाव का मुख्य कारण कमजोर पूंजी प्रवाह था, न कि आर्थिक बुनियादी ढांचे की कमजोरी। रिपोर्ट का मानना है कि हाल के नीतिगत फैसले विदेशी निवेश बढ़ाने और भुगतान संतुलन को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाएंगे, जिससे भारतीय रुपये को भी मजबूती मिलने की संभावना है।
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