मध्य हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन का असर अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। बदलते मौसम, सूखते प्राकृतिक जलस्रोत, घटता कृषि उत्पादन और बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं ने पहाड़ों में रहने वाले लोगों के सामने गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। हालिया अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो हिमालयी क्षेत्र का पर्यावरणीय और सामाजिक संतुलन और अधिक प्रभावित हो सकता है।
मिजोरम विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विश्वंभर प्रसाद सती के अध्ययन के अनुसार, बदलती जलवायु का सबसे अधिक असर कृषि और बागवानी पर पड़ा है। उत्पादन में लगातार गिरावट से ग्रामीण अर्थव्यवस्था कमजोर हुई है और रोजगार के अवसर कम होने के कारण बड़े पैमाने पर पलायन बढ़ा है। रिपोर्ट के मुताबिक उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों से 20 प्रतिशत से अधिक आबादी पलायन कर चुकी है, जबकि 1,700 से ज्यादा गांव खाली होकर ‘भुतहा गांव’ बन चुके हैं।
अध्ययन में यह भी सामने आया है कि पारंपरिक जलस्रोत तेजी से सूख रहे हैं। भूमि के बंजर होने से वर्षा का पानी जमीन में कम समा रहा है, जिससे भूजल स्तर लगातार गिर रहा है और कई क्षेत्रों में जल संकट गहराता जा रहा है।
जलवायु परिवर्तन का असर खेती पर भी साफ दिखाई दे रहा है। कई पारंपरिक फसलें समाप्त हो चुकी हैं, जबकि कुछ विलुप्त होने की कगार पर हैं। निचले इलाकों में कभी व्यापक रूप से होने वाली सेब और खट्टे फलों की खेती अब लगभग समाप्त हो गई है। वहीं मोटे अनाज के उत्पादन में गिरावट से खाद्य सुरक्षा को भी चुनौती मिल रही है।
रिपोर्ट के अनुसार बढ़ते तापमान के कारण वनस्पति संरचना में भी बड़ा बदलाव हो रहा है। चीड़ के जंगल ऊंचाई वाले क्षेत्रों तक फैल रहे हैं, जबकि बांज के वन लगातार सिमट रहे हैं। इससे हिमालय की जैव विविधता और पारिस्थितिक संतुलन पर खतरा बढ़ रहा है। पिछले तीन दशकों में हिमावरण में कमी और ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने का असर अलकनंदा और भागीरथी जैसी प्रमुख नदी घाटियों पर भी देखा गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि वर्षा के बदलते पैटर्न और चरम मौसमी घटनाओं ने बादल फटना, बाढ़, भूस्खलन और हिमनद झील फटने जैसी आपदाओं का खतरा बढ़ा दिया है। वर्ष 2020 से 2022 के बीच उत्तराखंड में 200 से अधिक प्राकृतिक आपदाएं दर्ज की गईं। इसके अलावा वनाग्नि की घटनाओं में भी लगातार वृद्धि हो रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालय जलवायु परिवर्तन के प्रति बेहद संवेदनशील क्षेत्र बन चुका है। ऐसे में पर्यावरण संरक्षण, जलस्रोतों के पुनर्जीवन और टिकाऊ विकास की दिशा में ठोस कदम उठाना समय की सबसे बड़ी जरूरत है।
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