2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने गोरखपुर क्षेत्र में संगठन और चुनावी तैयारियों को लेकर मंथन तेज कर दिया है। प्रदेश प्रभारी और राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े का तीन दिवसीय गोरखपुर दौरा सिर्फ संगठनात्मक बैठकों तक सीमित नहीं रहा। इस दौरान उन्होंने नेताओं, कार्यकर्ताओं, युवाओं और समाज के अलग-अलग वर्गों से बातचीत कर जमीनी फीडबैक लेने की कोशिश की।
तावड़े की कार्यशैली का मुख्य फोकस पहले सुनने, फिर समस्याओं और परिस्थितियों को समझने और उसके बाद रणनीति तैयार करने पर रहा। उन्होंने अलग-अलग लोगों से मिले फीडबैक को एक-दूसरे से मिलाकर क्षेत्र की राजनीतिक स्थिति को समझने की कोशिश की।
13 लोकसभा सीटों में भाजपा का प्रदर्शन बदला
गोरखपुर क्षेत्र में भाजपा के प्रदर्शन में पिछले कुछ चुनावों के दौरान बदलाव आया है। 13 लोकसभा सीटों वाले इस क्षेत्र में भाजपा ने 2014 में 12 सीटें जीती थीं। 2019 में यह आंकड़ा घटकर 10 हुआ और 2024 में भाजपा छह सीटों पर रह गई। विधानसभा चुनावों में भी 2017 में भाजपा ने 49 सीटें जीती थीं, जबकि 2022 में यह संख्या 35 रह गई।
इसी बदलते चुनावी आंकड़े के बीच तावड़े के दौरे को क्षेत्र की राजनीतिक स्थिति समझने की कवायद के तौर पर देखा गया। पार्टी के सामने 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले संगठन की स्थिति, सामाजिक समीकरण और स्थानीय मुद्दों को समझने की चुनौती है।
युवाओं से लेकर वरिष्ठ नेताओं तक संवाद
तावड़े ने अपने दौरे की शुरुआत नई पीढ़ी से संवाद के साथ की। उन्होंने सहजनवां स्थित अटल आवासीय विद्यालय में विद्यार्थियों से मुलाकात कर जेन जी और जेन अल्फा की आकांक्षाओं को समझने की कोशिश की। इसके बाद उन्होंने संगठन के वर्तमान और पूर्व पदाधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और समाज के अलग-अलग वर्गों के लोगों से बातचीत की।
कई मुलाकातें समूह में हुईं, जबकि कुछ लोगों से उन्होंने व्यक्तिगत रूप से बातचीत की। इसका उद्देश्य स्थानीय स्तर पर संगठन और राजनीति को लेकर अलग-अलग वर्गों का फीडबैक समझना था।
संगठन की मजबूती और गुटबाजी पर सवाल
तावड़े ने संगठन की मजबूती और कमजोरियों को लेकर भी जानकारी ली। उन्होंने जिलों में पार्टी की गतिविधियों, सक्रिय और निष्क्रिय कार्यकर्ताओं तथा संगठन के भीतर की गुटबाजी से जुड़े मुद्दों पर सवाल किए। स्थानीय नेताओं के बीच मतभेद और उससे संगठन पर पड़ने वाले असर को लेकर भी जानकारी जुटाई गई।
उन्होंने यह भी जानने की कोशिश की कि आपसी विवाद में उलझे नेताओं के बीच सुलह कौन करा सकता है और पिछले चुनावों में जिम्मेदारी संभालने के बाद निष्क्रिय हुए कार्यकर्ताओं को दोबारा कैसे जोड़ा जा सकता है।
स्थानीय मुद्दों पर भी मिला फीडबैक
बैठकों के दौरान भ्रष्टाचार, महंगाई, थाना और तहसील से जुड़ी समस्याओं समेत कई स्थानीय मुद्दे सामने आए। कुछ लोगों ने प्रशासनिक व्यवहार को भी आगामी चुनाव में मुद्दा बनने की आशंका जताई।
इसके अलावा आरक्षण, युवाओं के बीच रोजगार और पेपरलीक जैसे मुद्दों पर भी अलग-अलग सामाजिक समूहों की चिंताओं का फीडबैक तावड़े को मिला। रिपोर्ट के अनुसार, सोशल मीडिया पर विपक्ष के हमले को लेकर भी पार्टी के भीतर चर्चा हुई।
सहयोगी दलों के समीकरण पर भी नजर
पूर्वांचल की राजनीति में सहयोगी दलों की भूमिका को देखते हुए तावड़े ने निषाद पार्टी के नेता और कैबिनेट मंत्री डॉ. संजय निषाद से भी मुलाकात की। रिपोर्ट के अनुसार, बातचीत में उनके मुद्दों और क्षेत्रीय समीकरणों को समझने की कोशिश की गई।
इसके साथ ही भाजपा के भीतर के राजनीतिक समीकरणों को समझने के लिए डॉ. राधा मोहन दास अग्रवाल से उनके आवास पर मुलाकात भी की गई।
सीट-दर-सीट रणनीति पर जोर
तावड़े के दौरे से यह संकेत मिला कि भाजपा पूरे गोरखपुर क्षेत्र के लिए एक ही रणनीति के बजाय सीट-दर-सीट स्थिति का आकलन करना चाहती है। पार्टी यह समझने की कोशिश कर रही है कि कहां संगठन कमजोर है, कहां स्थानीय स्तर पर असंतोष है, किन सीटों पर जातीय समीकरण बदल रहे हैं और किन क्षेत्रों में सहयोगी दलों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
नई पीढ़ी और पुराने संगठन के बीच संतुलन की चुनौती
पार्टी के सामने नई पीढ़ी को राजनीतिक अवसर देने और पुराने नेताओं को साथ बनाए रखने का सवाल भी है। रिपोर्ट के मुताबिक, कई पुराने नेता संगठन में अपनी भूमिका बनाए रखना चाहते हैं, वहीं लंबे समय से पार्टी के साथ काम कर रही नई पीढ़ी भी राजनीतिक प्रतिनिधित्व की उम्मीद कर रही है। महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने की अपेक्षा भी सामने आई है।
गोरखपुर के आंकड़ों पर नजर
गोरखपुर क्षेत्र की 13 लोकसभा सीटों पर भाजपा के प्रदर्शन का आंकड़ा इस प्रकार रहा:
- 2014: 12 सीटें
- 2019: 10 सीटें
- 2024: 6 सीटें
विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 2017 में 49 सीटें जीती थीं, जबकि 2022 में 35 सीटें मिलीं।
इस लिहाज से विनोद तावड़े का तीन दिवसीय दौरा पार्टी के संगठन, स्थानीय मुद्दों, सामाजिक समीकरणों और चुनावी प्रदर्शन के कारणों को समझने की कवायद के तौर पर सामने आया है। रिपोर्ट के अनुसार, तावड़े करीब एक महीने बाद दोबारा गोरखपुर आने की बात कहकर गए हैं।
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