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उत्तराखंड में आपदा से बचाव की नई पहल: चमोली की ग्लेशियर झीलों से खतरे का एक घंटे पहले अलर्ट

उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर झीलों से पैदा होने वाले संभावित खतरे से निपटने के लिए स्वदेशी अर्ली वार्निंग सिस्टम तैयार किया गया है। केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (सीबीआरआई), रुड़की अब चमोली जिले के वसुंधरा ताल में यह अत्याधुनिक सिस्टम स्थापित करेगा।

इस तकनीक का इस्तेमाल पहले मनाली में किया जा चुका है, जहां करीब एक साल से लगातार डेटा जुटाया जा रहा है। अब इसी प्रणाली को वसुंधरा ताल में लगाया जाएगा। वैज्ञानिकों का लक्ष्य है कि संभावित खतरे की स्थिति में सिस्टम करीब एक घंटे पहले अलर्ट जारी कर सके।

बारिश से जलस्तर तक हर बदलाव पर नजर

वसुंधरा ताल में एक विशेष टॉवर लगाया जाएगा। इसमें आधुनिक सेंसर लगाए जाएंगे, जो बारिश, बर्फबारी, झील के आकार, जलस्तर और पानी के बहाव में होने वाले बदलावों की लगातार निगरानी करेंगे।

सिस्टम झील से जुड़े प्राकृतिक बदलावों और संभावित आपदा का डेटा व तस्वीरें रीयल टाइम में निगरानी केंद्र तक भेजेगा। हिमखंड के झील में गिरने, जलस्तर अचानक बढ़ने या प्राकृतिक बांध में दरार जैसी असामान्य स्थिति सामने आने पर सेंसर एक से दो मिनट के भीतर कंट्रोल रूम को सूचना भेज देंगे।

सेटेलाइट से जुड़े होंगे सेंसर

सेंसर सेटेलाइट से जुड़े होंगे और घटनाक्रम की पुष्टि के लिए कैमरे भी लगाए जाएंगे। विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि वसुंधरा ताल टूटता है तो पानी और मलबा करीब 20 किलोमीटर नीचे तक महज आठ से दस मिनट में पहुंच सकता है। ऐसे में समय रहते चेतावनी मिलने से संवेदनशील क्षेत्रों में जान-माल के नुकसान को कम करने में मदद मिलेगी।

सीबीआरआई के अनुसार यह सिस्टम संभावित खतरे की पहले पहचान कर संबंधित तंत्र को अलर्ट देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। तकनीक के डिजाइन और विकास में वैज्ञानिक चंद्रभान पटेल, कांति एल. सोलंकी और डॉ. डीपी कानूनगो की प्रमुख भूमिका रही है।

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