अमेरिका में विदेशी कर्मचारियों की नियुक्ति और वीजा व्यवस्था को लेकर विवाद तेज हो गया है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने माइक्रोसॉफ्ट समेत कई बड़ी IT कंपनियों पर H-1B वीजा व्यवस्था के दुरुपयोग का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि कुछ कंपनियां अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी से निकालकर उनकी जगह कम वेतन पर विदेशी पेशेवरों को नियुक्त कर रही हैं। वेंस ने आउटसोर्सिंग कंपनियों के जरिए अमेरिका आने वाले विदेशी कर्मचारियों को ‘बंधुआ मजदूर’ तक कहा है।
इस बीच, अमेरिकी प्रशासन ने माइक्रोसॉफ्ट, इन्फोसिस, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS), विप्रो और अन्य कंपनियों के खिलाफ ग्रीन कार्ड से जुड़ी श्रम प्रमाणन प्रक्रिया पर कार्रवाई की है। इस कदम से अमेरिका में काम कर रहे भारतीय IT पेशेवरों, खासकर स्थायी निवास की प्रक्रिया में शामिल कर्मचारियों की चिंता बढ़ सकती है।
वेंस ने विदेशी कर्मचारियों की नियुक्ति पर उठाए सवाल
जेडी वेंस ने आरोप लगाया कि कुछ कंपनियां विदेशी कर्मचारियों को अपेक्षाकृत कम वेतन देकर नियुक्त करती हैं, जिससे अमेरिकी कर्मचारियों के रोजगार और वेतन पर दबाव पड़ता है। उनके मुताबिक, H-1B वीजा व्यवस्था का इस्तेमाल कुछ नियोक्ता अपनी श्रम लागत कम करने के लिए कर रहे हैं।
वेंस ने दावा किया कि H-1B वीजा पर काम करने वाले विदेशी पेशेवरों और अमेरिकी कर्मचारियों के वेतन में बड़ा अंतर है। उन्होंने सामान्य मामलों में करीब 20 हजार डॉलर और आउटसोर्सिंग कंपनियों के माध्यम से नियुक्त कर्मचारियों के मामलों में 48 हजार डॉलर तक के अंतर का उल्लेख किया। हालांकि, ये आंकड़े और आरोप अमेरिकी प्रशासन के दावों पर आधारित हैं।
माइक्रोसॉफ्ट पर क्यों उठे सवाल?
वेंस ने माइक्रोसॉफ्ट का उदाहरण देते हुए कहा कि कंपनी ने वर्ष 2025 में लगभग छह हजार अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी की, जबकि इसी दौरान बड़ी संख्या में H-1B वीजा मंजूर कराए गए। उन्होंने कंपनी की ओर से विदेशी कर्मचारियों को ग्रीन कार्ड दिलाने के लिए दाखिल श्रम प्रमाणन अर्जियों पर भी सवाल उठाए।
वेंस के अनुसार, माइक्रोसॉफ्ट ने 3,682 श्रम प्रमाणन अर्जियां दाखिल की थीं। इनमें से करीब एक हजार अर्जियां ऐसे पदों से संबंधित होने का दावा किया गया, जिन पर पहले अमेरिकी कर्मचारी काम कर रहे थे। इन आरोपों के आधार पर प्रशासन ने विदेशी कर्मचारियों की नियुक्ति और स्थायी निवास की प्रक्रिया की जांच तेज की है।
भारतीय IT कंपनियों पर भी कार्रवाई
अमेरिकी प्रशासन की कार्रवाई के दायरे में माइक्रोसॉफ्ट के अलावा कॉग्निजेंट, इन्फोसिस, TCS, विप्रो, HCL टेक्नोलॉजीज, कैपजेमिनी और एडोबी जैसी कंपनियों के नाम भी शामिल हैं।
श्रम प्रमाणन प्रक्रिया पर रोक का मतलब है कि संबंधित कंपनियों के माध्यम से ग्रीन कार्ड हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ रही नई और लंबित अर्जियों की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। हालांकि, इस कदम को सभी विदेशी कर्मचारियों के H-1B वीजा रद्द होने या इन कंपनियों में काम कर रहे सभी भारतीयों की नौकरी समाप्त होने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
नौ विश्वविद्यालय भी जांच के दायरे में
अमेरिकी प्रशासन ने हार्वर्ड, येल और स्टैनफोर्ड समेत नौ विश्वविद्यालयों की जांच शुरू करने की भी घोषणा की है। प्रशासन को आशंका है कि कुछ संस्थानों में विदेशी छात्रों और कर्मचारियों से जुड़े कार्यक्रमों का इस्तेमाल अमेरिकी कर्मचारियों के वेतन पर दबाव डालने के लिए किया जा सकता है।
अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, जांच में विदेशी प्रभाव, वित्तीय संबंधों और वीजा नियमों के संभावित उल्लंघन जैसे पहलुओं को भी देखा जाएगा। इस संबंध में विश्वविद्यालयों को समन जारी किए जाने की जानकारी दी गई है।
H-1B वीजा और ग्रीन कार्ड में क्या अंतर है?
H-1B वीजा के जरिए योग्य विदेशी पेशेवर अमेरिका में अस्थायी रूप से काम कर सकते हैं। दूसरी ओर, ग्रीन कार्ड अमेरिका में स्थायी रूप से रहने और काम करने का अधिकार देता है।
रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड की कई श्रेणियों में नियोक्ता को पहले श्रम प्रमाणन प्रक्रिया पूरी करनी पड़ती है। इस प्रक्रिया में यह साबित करना होता है कि विदेशी कर्मचारी की नियुक्ति से अमेरिकी कर्मचारियों के वेतन और कामकाजी परिस्थितियों पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
इसलिए H-1B वीजा और ग्रीन कार्ड की प्रक्रियाओं को अलग-अलग समझना जरूरी है। ग्रीन कार्ड से जुड़ी प्रक्रिया प्रभावित होने का अर्थ यह नहीं है कि संबंधित कर्मचारी का मौजूदा H-1B वीजा अपने आप रद्द हो जाएगा।
भारतीय पेशेवरों और कंपनियों पर क्या पड़ेगा असर?
इस कार्रवाई का सबसे सीधा असर उन भारतीय पेशेवरों पर पड़ सकता है, जो अपने नियोक्ता के माध्यम से ग्रीन कार्ड पाने की प्रक्रिया में हैं। प्रक्रिया लंबित रहने से उनके स्थायी निवास की योजना प्रभावित हो सकती है और अमेरिका में लंबे समय तक रहने को लेकर अनिश्चितता बढ़ सकती है।
भारतीय IT कंपनियों को भी अमेरिका में भर्ती, कर्मचारियों की तैनाती और दीर्घकालिक मानव संसाधन योजना में बदलाव करने पड़ सकते हैं। कंपनियां स्थानीय स्तर पर भर्ती बढ़ाने और अपने कामकाज के मॉडल की समीक्षा करने पर विचार कर सकती हैं।
हालांकि, इसका वास्तविक प्रभाव अमेरिकी प्रशासन के अगले कदमों, संबंधित कंपनियों की प्रतिक्रिया और श्रम प्रमाणन प्रक्रिया पर लागू होने वाली शर्तों पर निर्भर करेगा।
निष्कर्ष: अमेरिका में विदेशी कर्मचारियों की नियुक्ति और ग्रीन कार्ड प्रक्रिया को लेकर सख्ती से भारतीय IT कंपनियों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। फिलहाल सबसे बड़ी चिंता उन कर्मचारियों को लेकर है, जो स्थायी निवास पाने की प्रक्रिया में शामिल हैं। यह कार्रवाई H-1B वीजा व्यवस्था पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं है, इसलिए इसके प्रभाव को समझने के लिए वीजा और ग्रीन कार्ड से जुड़े नियमों के अंतर पर ध्यान देना जरूरी है।
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