उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले होने वाले राज्यसभा चुनाव को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। भाजपा जहां अपने आठ उम्मीदवारों को जिताने के लिए संख्या बल का आकलन कर रही है, वहीं पार्टी की नजर अब नौंवीं सीट पर भी है। इसके लिए भाजपा को करीब 25 अतिरिक्त वोटों की जरूरत बताई जा रही है।
चुनावी गणित के मुताबिक, एक राज्यसभा सीट के लिए 36 वोट का कोटा माना जा रहा है। ऐसे में आठ सीटों के लिए 288 वोटों की जरूरत होगी। भाजपा अपने 259 विधायकों के अलावा सहयोगी दलों और अन्य समर्थक विधायकों को मिलाकर करीब 299 वोटों के समर्थन का दावा कर रही है। इस गणित में आठ उम्मीदवारों को जिताने के बाद करीब 11 वोट अतिरिक्त बचते हैं।
नौंवीं सीट के लिए 36 वोटों की जरूरत होने के कारण भाजपा को करीब 25 और वोट जुटाने होंगे। यही वजह है कि पार्टी की नजर विपक्षी खेमे, खासकर समाजवादी पार्टी के उन विधायकों पर है, जिनके राजनीतिक समीकरण भाजपा के साथ बने हुए हैं।
सपा के बागी विधायकों पर नजर
पिछले राज्यसभा चुनाव में सपा के कुछ विधायकों ने पार्टी लाइन से अलग रुख अपनाया था। इनमें मनोज कुमार पांडेय, पूजा पाल, राकेश प्रताप सिंह, अभय सिंह, विनोद चतुर्वेदी, आशुतोष मौर्या और महाराजी देवी के नाम सामने आए थे। भाजपा अब ऐसे विधायकों के समर्थन की संभावनाओं पर नजर रख रही है।
हालांकि, नौंवीं सीट के लिए 25 अतिरिक्त वोट जुटाना भाजपा के सामने बड़ी चुनौती है। रिपोर्ट के मुताबिक, सपा के कुछ विधायक भाजपा के संपर्क में होने की चर्चा है, लेकिन 2027 के विधानसभा चुनाव में राजनीतिक भविष्य और टिकट को लेकर उनकी अपनी शर्तें भी बताई जा रही हैं।
आठवीं सीट के बाद बढ़ेगी असली चुनौती
भाजपा के लिए आठवीं सीट का गणित भी सहयोगी और समर्थक विधायकों के समर्थन पर निर्भर करेगा। ऐसे में नौंवीं सीट के लिए अतिरिक्त वोट जुटाने की कोशिश मुकाबले को और दिलचस्प बना सकती है।
नामांकन से लेकर मतदान तक भाजपा और सपा दोनों की नजर अपने-अपने विधायकों के साथ दूसरे खेमे के संभावित असंतुष्ट विधायकों पर रहेगी। राज्यसभा चुनाव में 25 अतिरिक्त वोटों का यह गणित अब उत्तर प्रदेश की सियासत में चर्चा का प्रमुख केंद्र बन गया है।
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