उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले राज्य की राजनीति नए दौर में प्रवेश करती नजर आ रही है। लंबे समय तक पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमने वाली सियासत में अब ब्राह्मण वोट बैंक एक बार फिर प्रमुख चर्चा का विषय बन गया है। सभी प्रमुख राजनीतिक दल इस वर्ग को अपने पक्ष में करने की रणनीति बनाने में जुटे हैं।
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपने चर्चित PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) समीकरण को नया राजनीतिक विस्तार देते हुए कहा कि अब इसमें ‘पंडित’ भी शामिल हैं। उनके इस बयान को आगामी विधानसभा चुनाव से पहले ब्राह्मण समाज को साधने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण मतदाता कई सीटों पर जीत-हार तय करने की क्षमता रखते हैं। यही कारण है कि भाजपा, समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बसपा सभी इस वर्ग के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने के प्रयास में हैं।
भाजपा पहले से ही ब्राह्मण समाज में अपनी मजबूत पैठ का दावा करती रही है। वहीं विपक्षी दल लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि वे भी इस वर्ग को राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सम्मान देने के पक्षधर हैं। ऐसे में अखिलेश यादव का PDA को नया अर्थ देना चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, 2027 विधानसभा चुनाव से पहले जातीय और सामाजिक समीकरणों की नई बिसात बिछ चुकी है। आने वाले महीनों में विभिन्न दलों के सम्मेलन, जनसभाएं और सामाजिक संपर्क अभियान इस बात का संकेत देंगे कि ब्राह्मण वोट बैंक को लेकर सियासी मुकाबला कितना तेज होने वाला है।
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