पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच वैश्विक ऊर्जा बाजार एक बार फिर दबाव में आ गया है। ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों की ओर से बाब-अल-मंदेब जलमार्ग को बाधित किए जाने की आशंका और होर्मुज जलडमरूमध्य में पहले से जारी तनाव ने दुनिया के दो सबसे अहम समुद्री तेल मार्गों पर संकट खड़ा कर दिया है। यदि दोनों मार्गों पर लंबे समय तक व्यवधान बना रहता है तो इसका सीधा असर वैश्विक कच्चे तेल की आपूर्ति, शिपिंग लागत और भारत समेत कई देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ने के बाद खाड़ी देशों ने तेल निर्यात के लिए लाल सागर मार्ग का अधिक इस्तेमाल शुरू कर दिया था। हाल के सप्ताहों में लाल सागर से प्रतिदिन लगभग 40 लाख बैरल कच्चे तेल का परिवहन हुआ, जबकि जून में बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य से गुजरने वाला कुल पेट्रोलियम परिवहन 74 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया। यह वैश्विक तेल उत्पादन का लगभग 7 प्रतिशत माना जाता है।
भारत के लिए यह स्थिति इसलिए अधिक गंभीर है क्योंकि देश का लगभग 95 प्रतिशत व्यापार मात्रा के हिसाब से समुद्री मार्ग पर निर्भर है। वहीं मूल्य के आधार पर करीब 70 प्रतिशत व्यापार समुद्र के जरिए होता है। भारत के कुल निर्यात का लगभग आधा हिस्सा लाल सागर मार्ग से गुजरता है, जबकि यूरोप के साथ करीब 80 प्रतिशत व्यापार लाल सागर और स्वेज नहर के रास्ते होता है। ऐसे में इस मार्ग पर किसी भी तरह का व्यवधान भारतीय व्यापार और आपूर्ति श्रृंखला पर बड़ा असर डाल सकता है।
आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि यदि संकट लंबा खिंचता है तो भारत को निर्यात के मोर्चे पर अरबों डॉलर का नुकसान उठाना पड़ सकता है। कृषि, कपड़ा, रसायन, पेट्रोलियम उत्पाद और विनिर्माण जैसे प्रमुख क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं। इसके अलावा माल ढुलाई की लागत बढ़ने से आयात-निर्यात दोनों महंगे हो जाएंगे और उद्योगों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ेगा।
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का असर आम लोगों पर भी पड़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंचने की आशंका जताई जा रही है। हालांकि भारत के पास रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार मौजूद हैं, जो अल्पकालिक संकट से निपटने में मदद कर सकते हैं। लेकिन यदि लाल सागर और होर्मुज का संकट लंबे समय तक जारी रहा तो सरकारी तेल कंपनियों पर दबाव बढ़ेगा और पेट्रोल, डीजल, एलपीजी तथा विमान ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
ईंधन महंगा होने का असर केवल वाहन चालकों तक सीमित नहीं रहेगा। परिवहन लागत बढ़ने से खाद्य पदार्थों, उपभोक्ता वस्तुओं, निर्माण सामग्री और अन्य आवश्यक सामान की कीमतों पर भी असर पड़ सकता है। ऐसे में पश्चिम एशिया के हालात पर भारत समेत पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है, क्योंकि इन समुद्री मार्गों की स्थिति आने वाले दिनों में वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा तय कर सकती है।
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