उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिला अस्पताल में दिव्यांग प्रमाण पत्र बनाने के नाम पर कथित भ्रष्टाचार और दलालों के सक्रिय नेटवर्क का बड़ा खुलासा हुआ है। एक स्टिंग ऑपरेशन में दावा किया गया है कि 10 से 12 हजार रुपये लेकर पूरी तरह स्वस्थ व्यक्ति का भी 45 प्रतिशत दिव्यांगता प्रमाण पत्र बनवाया जा रहा है। वहीं, वास्तविक दिव्यांगजन वर्षों से सरकारी कार्यालयों के चक्कर काटने को मजबूर हैं। इस खुलासे के बाद जिला अस्पताल और मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) कार्यालय की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
स्टिंग के दौरान कथित दलालों ने दावा किया कि केवल आधार कार्ड और एक फोटो के आधार पर दो सप्ताह के भीतर 45 प्रतिशत दिव्यांगता प्रमाण पत्र बनवाया जा सकता है। उनका यह भी कहना था कि पूरी प्रक्रिया में किसी मेडिकल जांच या मेडिकल बोर्ड से वास्तविक परीक्षण की जरूरत नहीं पड़ेगी। आरोप है कि ली गई रकम का हिस्सा संबंधित कर्मचारियों और अन्य लोगों तक पहुंचाया जाता है।
स्टिंग में कथित तौर पर सीएमओ कार्यालय से जुड़े एक इंस्पेक्टर, ब्लड बैंक के एक लिपिक और दिव्यांग भवन के एक कर्मचारी से बातचीत भी सामने आई। बातचीत में कथित तौर पर बताया गया कि आंख की दिव्यांगता पर फिलहाल 40 प्रतिशत तक का प्रमाण पत्र बनता है, जबकि हड्डी की दिव्यांगता दिखाकर 45 प्रतिशत का प्रमाण पत्र बनवाया जा सकता है, जिसके लिए 10 हजार रुपये से अधिक खर्च होंगे।
सबसे चौंकाने वाला दावा तब सामने आया जब कथित तौर पर एक कर्मचारी ने कहा कि यदि भविष्य में मामला पकड़ा भी गया तो यह कह दिया जाएगा कि जांच के समय व्यक्ति दिव्यांग था और बाद में इलाज से ठीक हो गया। स्टिंग में यह भी आरोप लगाया गया कि कुछ कर्मचारी स्वयं भी दिव्यांग प्रमाण पत्र का लाभ ले रहे हैं।
दूसरी ओर, वास्तविक दिव्यांगों की स्थिति बेहद चिंताजनक बताई गई। भीमापुर निवासी गुड्डू ने बताया कि वह पिछले दो वर्षों से प्रमाण पत्र बनवाने के लिए चक्कर लगा रहा है, लेकिन अब तक सफलता नहीं मिली। वहीं, जन्मजात मूक-बधिर दंपती जवाहिर और अद्रिता को जिला अस्पताल से अतरौलिया और फिर बीएचयू वाराणसी रेफर किया गया, लेकिन डेढ़ वर्ष बाद भी उनका प्रमाण पत्र नहीं बन सका। इसी तरह पुरंदरपुर निवासी ऋषभ राय ने बताया कि वर्ष 2022 में आवेदन करने के बावजूद आज तक उनका दिव्यांग प्रमाण पत्र जारी नहीं हुआ।
नियमों के अनुसार दिव्यांग प्रमाण पत्र बनवाने के लिए पहले यूडीआईडी (UDID) पोर्टल पर ऑनलाइन आवेदन करना होता है। इसके बाद जिला अस्पताल के मेडिकल बोर्ड द्वारा विस्तृत चिकित्सीय जांच के आधार पर दिव्यांगता का प्रतिशत तय किया जाता है और उसी के आधार पर प्रमाण पत्र जारी किया जाता है। स्टिंग में सामने आए दावे इस पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
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