भारत में दालों का घरेलू उत्पादन बढ़ने के साथ आयात पर निर्भरता कम होती दिखाई दे रही है। वर्ष 2025-26 में देश में दालों का उत्पादन बढ़कर 274.09 लाख टन पहुंच गया। वहीं, दालों के आयात का मूल्य 31.52 प्रतिशत घटकर 31,793.59 करोड़ रुपये रह गया। दूसरी ओर, दालों के निर्यात में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। सरकार ने इस क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए 11,440 करोड़ रुपये की योजना शुरू की है।
दालों के उत्पादन में कितनी हुई बढ़ोतरी?
सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2024-25 में देश में दालों का उत्पादन 256.83 लाख टन था, जो 2025-26 में बढ़कर 274.09 लाख टन हो गया। इस तरह एक साल में उत्पादन में 17.26 लाख टन की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
दालों की खेती का रकबा भी बढ़ा है। वर्ष 2024-25 में जहां 277.20 लाख हेक्टेयर में दालों की खेती हुई थी, वहीं 2025-26 में यह बढ़कर 286.46 लाख हेक्टेयर हो गया। इसके साथ ही प्रति हेक्टेयर औसत पैदावार 926 किलोग्राम से बढ़कर 957 किलोग्राम पहुंच गई।
दालों के आयात में 31.52 प्रतिशत की गिरावट
घरेलू उत्पादन में बढ़ोतरी के बीच दालों के आयात पर होने वाला खर्च भी कम हुआ है। आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024-25 में भारत ने 46,427.60 करोड़ रुपये की दालों का आयात किया था। वर्ष 2025-26 में यह राशि घटकर 31,793.59 करोड़ रुपये रह गई।
इस तरह दालों के आयात मूल्य में 31.52 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। घरेलू उत्पादन बढ़ने से विदेशी बाजारों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, आयात में गिरावट के पीछे केवल उत्पादन में बढ़ोतरी को ही एकमात्र कारण नहीं माना जा सकता।
दालों के निर्यात में भी आया उछाल
भारत से दालों का निर्यात भी बढ़ा है। वर्ष 2024-25 में दालों का निर्यात 855 मिलियन डॉलर का था, जो 2025-26 में बढ़कर 969.53 मिलियन डॉलर पहुंच गया। इस दौरान कुल 10.01 लाख टन दालों का निर्यात किया गया।
भारत से दालों की खरीद करने वाले प्रमुख देशों में चीन, संयुक्त अरब अमीरात, बांग्लादेश, अमेरिका और श्रीलंका शामिल हैं। निर्यात में बढ़ोतरी से भारतीय कृषि उत्पादों की विदेशी बाजारों में पहुंच बढ़ने के संकेत मिलते हैं।
सरकार ने आत्मनिर्भरता के लिए बनाई 11,440 करोड़ रुपये की योजना
सरकार ने 11 अक्तूबर 2025 को दालों के उत्पादन में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए एक योजना की घोषणा की थी। इसके लिए 11,440 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया गया है। योजना का उद्देश्य दालों की खेती का रकबा बढ़ाने, पैदावार में सुधार करने और किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने में मदद करना है।
इसके तहत तूर, उड़द और मसूर जैसी प्रमुख दालों के उत्पादन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। साथ ही, किसानों को बेहतर और जलवायु के अनुकूल बीज उपलब्ध कराने की योजना भी है।
489 जिलों में उत्पादन बढ़ाने पर जोर
दालों का उत्पादन बढ़ाने के लिए सरकार ने 489 जिलों में समूह आधारित तरीके से काम करने की योजना बनाई है। अगले छह वर्षों में 87.5 लाख बीज किट मुफ्त वितरित करने और 126 लाख क्विंटल प्रमाणित बीज उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है।
इसके अलावा, इच्छुक और पंजीकृत किसानों से तूर, उड़द और मसूर की खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर एनसीसीएफ और नेफेड के माध्यम से की जा रही है। इससे किसानों को बाजार उपलब्ध कराने और दालों की खेती को प्रोत्साहित करने में मदद मिल सकती है।
2030-31 तक 350 लाख टन उत्पादन का लक्ष्य
सरकार का लक्ष्य वर्ष 2030-31 तक दालों का उत्पादन बढ़ाकर करीब 350 लाख टन करना है। इसके साथ ही प्रति हेक्टेयर औसत पैदावार को 1,130 किलोग्राम तक पहुंचाने की योजना है।
मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल देश के प्रमुख दाल उत्पादक राज्यों में शामिल हैं। इन राज्यों में उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने के प्रयास लक्ष्य हासिल करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
दालों में आत्मनिर्भरता क्यों है जरूरी?
दालें भारतीय खानपान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और प्रोटीन का प्रमुख स्रोत हैं। इनमें लगभग 20 से 25 प्रतिशत तक प्रोटीन पाया जाता है। घरेलू उत्पादन बढ़ने से देश की पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा करने में मदद मिल सकती है।
दालों का आयात कम होने और निर्यात बढ़ने से कृषि क्षेत्र को भी लाभ मिलने की संभावना है। हालांकि, वर्ष 2030-31 तक आत्मनिर्भरता का लक्ष्य हासिल करने के लिए उत्पादन में लगातार वृद्धि, बेहतर बीज, सिंचाई सुविधाओं और किसानों को उचित मूल्य मिलने जैसे पहलुओं पर ध्यान देना जरूरी होगा।
satyamorcha.com Hindi News, latest and breaking news in Hindi