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अमेरिका का बड़ा प्लान! ईरान को कमजोर करने के लिए किन देशों पर पड़ेगी मार, भारत पर कितना खतरा?

अमेरिका ने ईरान को आर्थिक रूप से पूरी तरह घेरने के लिए अब एक बड़ा अभियान शुरू करने की तैयारी कर ली है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने इसे ‘ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट’ नाम दिया है। इस अभियान का मकसद ईरान की आर्थिक ताकत को कमजोर करना और उसके वित्तीय संसाधनों, व्यापारिक नेटवर्क तथा अंतरराष्ट्रीय लेन-देन पर कड़ा शिकंजा कसना बताया गया है। अमेरिका अब सिर्फ ईरान को ही नहीं, बल्कि उसके साथ व्यापार और आर्थिक संबंध रखने वाले देशों और संस्थाओं पर भी दबाव बढ़ाने की रणनीति बना रहा है।

इस अभियान के तहत ईरान के जहाजरानी नेटवर्क, सोने के व्यापार, विमानन सेवाओं, तकनीकी खरीद और वित्तीय चैनलों को निशाना बनाया जा सकता है। सबसे बड़ा खतरा द्वितीयक प्रतिबंधों का है, जिसके दायरे में वे देश और कंपनियां भी आ सकती हैं जो सीधे तौर पर ईरान के साथ कारोबार करती हैं। अमेरिका का संदेश साफ माना जा रहा है कि ईरान के आर्थिक सहयोगियों को भी अब अपने व्यापारिक रिश्तों की कीमत चुकानी पड़ सकती है।

ईरान के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में यूएई, चीन, तुर्किये, यूरोपीय संघ, भारत और रूस जैसे देश शामिल हैं। चीन ईरान का बड़ा कारोबारी सहयोगी है, जबकि भारत भी ईरान को बासमती चावल, चाय, चीनी और अन्य जरूरी वस्तुओं का निर्यात करता है। ऐसे में अगर अमेरिका प्रतिबंधों का दायरा और बढ़ाता है तो भारत-ईरान व्यापार पर भी असर पड़ने की आशंका पैदा हो सकती है।

भारत के लिए सबसे अहम मुद्दा चाबहार बंदरगाह और ईरान के साथ उसकी रणनीतिक साझेदारी है। चाबहार भारत के लिए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच का महत्वपूर्ण रास्ता माना जाता है। ऐसे में अमेरिका की नई आर्थिक घेराबंदी भारत के सामने कूटनीतिक और व्यापारिक चुनौती खड़ी कर सकती है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि अमेरिका ईरान को अलग-थलग करने के लिए कितनी दूर तक जाएगा और क्या भारत को अपने राष्ट्रीय हितों और अमेरिकी दबाव के बीच नया संतुलन बनाना पड़ेगा।

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