टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी टाटा संस के शीर्ष प्रबंधन में चेयरमैन एन चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। टाटा संस के बोर्ड ने चंद्रशेखरन को पांच साल का नया कार्यकाल देने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी, लेकिन टाटा ट्रस्ट्स ने इस फैसले पर गंभीर कानूनी आपत्ति जताई है। ट्रस्ट्स ने बोर्ड के फैसले को गैर-कानूनी और नियमों के विपरीत बताया है।
ट्रस्ट्स ने पुनर्नियुक्ति को क्यों बताया गैर-कानूनी?
टाटा ट्रस्ट्स का कहना है कि टाटा संस के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन के तहत चेयरमैन की नियुक्ति या पुनर्नियुक्ति के प्रस्ताव के लिए ट्रस्ट्स द्वारा नामित दोनों निदेशकों की मौजूदगी और सहमति जरूरी है।
बृहस्पतिवार को हुई बोर्ड बैठक में चंद्रशेखरन के नए कार्यकाल के प्रस्ताव पर चार निदेशकों ने समर्थन में मतदान किया, जबकि टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन और नामित निदेशक नोएल टाटा ने इसका विरोध किया। ट्रस्ट्स का तर्क है कि नोएल टाटा के विरोध में मतदान करने के बाद प्रस्ताव कानूनी रूप से प्रभावी नहीं रह जाता।
बोर्ड के सामने रखी गई पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़ की राय
टाटा ट्रस्ट्स के मुताबिक, नोएल टाटा ने इस मुद्दे पर देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की कानूनी राय भी बोर्ड के सामने रखी थी। ट्रस्ट्स का कहना है कि इस राय पर बोर्ड ने विचार नहीं किया।
इसके अलावा ट्रस्ट्स ने चंद्रशेखरन के 12 अगस्त के फैसले का भी हवाला दिया है। उस समय चंद्रशेखरन ने कथित तौर पर अगला कार्यकाल नहीं लेने की इच्छा जताई थी। ट्रस्ट्स का कहना है कि उनका यह फैसला पहले ही स्वीकार किया जा चुका था और उत्तराधिकारी की तलाश की प्रक्रिया शुरू हो गई थी।
आरबीआई के फैसले के बाद बदला बोर्ड का रुख
विवाद की एक बड़ी कड़ी टाटा संस की लिस्टिंग से जुड़ी है। भारतीय रिजर्व बैंक ने 11 सितंबर को टाटा संस की कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी का पंजीकरण सरेंडर करने की अर्जी खारिज कर दी थी।
आरबीआई ने 2022 में टाटा संस को ‘अपर लेयर एनबीएफसी’ के रूप में वर्गीकृत किया था। इसके तहत कंपनी के लिए तीन साल के भीतर शेयर बाजार में सूचीबद्ध होना जरूरी था। कंपनी ने लिस्टिंग से छूट पाने के लिए 21,000 करोड़ रुपये से अधिक का बकाया कर्ज भी चुकाया था।
आरबीआई से राहत नहीं मिलने के बाद बोर्ड ने अपने रुख पर दोबारा विचार किया। बोर्ड का मानना बताया गया कि संभावित आईपीओ से पहले कंपनी के शीर्ष नेतृत्व में निरंतरता निवेशकों के भरोसे के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकती है।
टाटा संस की लिस्टिंग पर भी मतभेद
टाटा संस की संभावित शेयर बाजार लिस्टिंग को लेकर प्रमुख शेयरधारकों के बीच भी मतभेद हैं। टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस में लगभग 66 प्रतिशत नियंत्रित हिस्सेदारी है और नोएल टाटा लिस्टिंग के विरोध में हैं।
वहीं, करीब 18 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाला शापूरजी पालोनजी (एसपी) समूह लंबे समय से कंपनी की लिस्टिंग की मांग करता रहा है। समूह का कहना है कि इससे कंपनी के मूल्यांकन में पारदर्शिता और शेयरधारकों को तरलता मिल सकती है।
ट्रस्ट्स के भीतर भी इस मुद्दे पर मतभेद की बात सामने आई है। सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट द्वारा नामित निदेशक वेणु श्रीनिवासन पर लिस्टिंग के खिलाफ मतदान करने का दबाव होने की बात कही गई, लेकिन उन्होंने स्वतंत्र निदेशक के कर्तव्य का हवाला देते हुए ऐसा करने से इनकार किया।
उत्तराधिकारी की तलाश भी बनी विवाद की वजह
चंद्रशेखरन के पहले पद छोड़ने की घोषणा के बाद सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट ने नए चेयरमैन की तलाश के लिए प्रक्रिया शुरू की थी। इस दौरान टाटा स्टील के सीईओ टीवी नरेंद्रन और टाटा संस के सीएफओ सौरभ अग्रवाल जैसे नामों पर चर्चा होने की बात सामने आई।
हालांकि, बोर्ड द्वारा चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति को मंजूरी दिए जाने के बाद उत्तराधिकारी चयन की यह प्रक्रिया प्रभावित हुई है। टाटा ट्रस्ट्स ने कहा है कि चयन समिति आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन के प्रावधानों के अनुसार उत्तराधिकारी की तलाश जारी रखेगी।
टाटा संस के आईपीओ से जुड़ा बड़ा सवाल
टाटा संस की संभावित लिस्टिंग इस पूरे विवाद का एक अहम पहलू है। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक, अगर टाटा संस का आईपीओ आता है तो यह भारतीय बाजार के सबसे बड़े आईपीओ में शामिल हो सकता है। कंपनी के संभावित मूल्यांकन और हिस्सेदारी बिक्री को लेकर भी बड़े आंकड़े सामने आए हैं।
ऐसे में चेयरमैन के कार्यकाल, बोर्ड के अधिकार, ट्रस्ट्स की भूमिका और संभावित लिस्टिंग—इन सभी मुद्दों के बीच टाटा संस का मौजूदा विवाद कॉरपोरेट गवर्नेंस और उत्तराधिकार की प्रक्रिया पर केंद्रित हो गया है।
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