आईपीओ की शानदार लिस्टिंग के बाद कई शेयरों में कुछ ही हफ्तों में दबाव देखने को मिलता है। अब बाजार नियामक SEBI की एक स्टडी ने इसके पीछे की अहम वजहों पर रोशनी डाली है। 242 मेनबोर्ड IPO पर किए गए अध्ययन के मुताबिक, एंकर निवेशकों की बिकवाली बढ़ने के साथ शेयरों की कीमतों पर दबाव बनता है और इसमें विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की भूमिका सबसे बड़ी नजर आती है।
30 दिन बाद क्या होता है?
SEBI की स्टडी के अनुसार, एंकर निवेशकों के लिए पहले 30 दिन का लॉक-इन खत्म होने के बाद शेयरों की बिक्री शुरू हो सकती है। हालांकि, सभी निवेशक तुरंत बड़ी मात्रा में शेयर नहीं बेचते। औसतन एंकर निवेशकों की करीब 3.2-3.5 फीसदी हिस्सेदारी पहले अनलॉक के आसपास बिकती है। इसके बाद 60 दिन पर यह करीब 8-9 फीसदी और 90 दिन पर लगभग 17-19 फीसदी तक पहुंच जाती है।
ज्यादा बिकवाली पर शेयरों में गिरावट
SEBI के अध्ययन में 30 दिन के अनलॉक के आसपास एंकर निवेशकों की बिकवाली और शेयर की कीमतों के बीच नकारात्मक संबंध पाया गया। जिन IPO में पहले अनलॉक विंडो के दौरान एंकर होल्डिंग का 10 फीसदी से ज्यादा हिस्सा बेचा गया, उनमें T+29 से T+33 के बीच शेयर की औसत कीमत करीब 3.5 फीसदी गिरी। ऐसे मामलों में औसत गिरावट का असर और ज्यादा रहा।
विदेशी निवेशक सबसे बड़े बिकवाल
SEBI की स्टडी में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक यानी FPI सबसे सक्रिय बिकवाल के तौर पर सामने आए हैं। एक साल के भीतर FPI अपने एंकर आवंटन का करीब 60 फीसदी बेच चुके थे, जबकि म्यूचुअल फंड ने करीब 38 फीसदी हिस्सेदारी बेची। FPI को कुल एंकर आवंटन का करीब 43.8 फीसदी हिस्सा मिला था।
रुपये के हिसाब से भी FPI की बिकवाली काफी बड़ी रही। अध्ययन के मुताबिक, एक साल के भीतर विदेशी निवेशकों ने करीब 22,474 करोड़ रुपये के एंकर शेयर बेचे, जबकि म्यूचुअल फंड की बिकवाली करीब 12,228 करोड़ रुपये रही।
एक साल में आधे से ज्यादा एंकर शेयर बिके
SEBI के अध्ययन में 167 IPO के एक साल के आंकड़ों से पता चला कि एंकर निवेशकों की कुल हिस्सेदारी में से करीब 51 फीसदी शेयर 365 दिनों में बिक गए। यह आंकड़ा 30 दिन पर करीब 4 फीसदी, 60 दिन पर 9 फीसदी, 90 दिन पर 19 फीसदी और 180 दिन पर करीब 34 फीसदी था।
छोटे IPO में ज्यादा बिकवाली
स्टडी में IPO के आकार और एंकर निवेशकों की बिकवाली के बीच भी संबंध पाया गया। 250 करोड़ रुपये तक के छोटे IPO में एक साल के भीतर करीब 72.5 फीसदी एंकर होल्डिंग बिक गई, जबकि 1,001-2,500 करोड़ रुपये के IPO में यह आंकड़ा करीब 40.8 फीसदी रहा।
निवेशकों के लिए क्या मायने?
SEBI की स्टडी से साफ है कि किसी IPO में बड़े संस्थागत या एंकर निवेशकों की भागीदारी को लंबे समय की प्रतिबद्धता नहीं माना जा सकता। लॉक-इन अवधि खत्म होने के बाद उनकी बिकवाली से शेयर की सप्लाई बढ़ सकती है और खासकर भारी बिकवाली की स्थिति में कीमतों पर दबाव आ सकता है। हालांकि, शेयर का प्रदर्शन केवल एंकर निवेशकों की बिकवाली पर निर्भर नहीं करता; कंपनी के कारोबार, वैल्यूएशन और बाजार की स्थिति भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
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