इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने राष्ट्रपति को इस्तीफा भेज दिया है। 14 मार्च 2025 को उनके दिल्ली स्थित सरकारी घर में आग लगने के दौरान 500-500 के नोटों के बंडल जले मिले थे। इसके बाद उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट ट्रांसफर कर दिया गया था।
उन्होंने 5 अप्रैल 2025 को इलाहाबाद हाईकोर्ट में शपथ ली थी, लेकिन उन्हें कोई जिम्मेदारी नहीं दी गई थी। मामले की जांच पूरी होने तक उन्हें न्यायिक कामों से दूर रखा गया था। जस्टिस वर्मा ने 9 अप्रैल को इस्तीफा भेजा था, लेकिन न्यूज एजेंसी ने अगले दिन, यानी 10 अप्रैल को इसकी जानकारी दी।
जस्टिस वर्मा ने इस्तीफे में लिखा है- मैं आपके सम्मानित कार्यालय को उन कारणों से परेशान नहीं करना चाहता, जिनकी वजह से मुझे यह पत्र लिखना पड़ रहा है। लेकिन गहरे दुख के साथ मैं इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पद से तत्काल प्रभाव से इस्तीफा दे रहा हूं। इस पद पर सेवा करना मेरे लिए सम्मान की बात रही है।
इस्तीफा के पहले जांच कमेटी को लिखा 13 पेज का लेटर, लगाए गंभीर आरोप
जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने इस्तीफे से पहले जजेस की इन्क्वायरी कमेटी को 13 पेज में एक लेटर भी लिखा है। लेटर में उन्होंने विस्तृत जवाब देते हुए पूरी जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं।उन्होंने लिखा कि जिस कैश रिकवरी को आधार बनाकर उनके खिलाफ कार्रवाई की गई, उसके संबंध में न तो कोई ठोस सबूत पेश किया गया और न ही यह साबित किया गया कि वह पैसा उनका था।
वर्मा के अनुसार, जिस स्टोररूम से नकदी मिलने की बात कही गई, वह उनके सीधे नियंत्रण में नहीं था और वहां कई लोगों की आवाजाही रहती थी। घटना के समय वे स्वयं भी घर पर मौजूद नहीं थे। उन्होंने दावा किया कि उन्हें इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी बाद में मिली।
उन्होंने जांच प्रक्रिया को पक्षपातपूर्ण बताते हुए लिखा कि कई महत्वपूर्ण गवाहों को या तो पेश ही नहीं किया गया, या फिर क्रॉस एग्जामिनेशन के बाद हटा दिया गया। जांच एजेंसियों ने अहम सबूत, जैसे CCTV फुटेज या अन्य रिकॉर्ड, भी सामने नहीं रखे।
बिना कोई प्रारंभिक (prima facie) मामला स्थापित किए ही उनसे अपनी बेगुनाही साबित करने को कहा गया, जो कानून के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। उन्होंने इसे अनुमानों और पूर्वाग्रहों पर आधारित कार्रवाई करार दिया।
मीडिया में इस मामले को जिस तरह प्रस्तुत किया गया, उससे उनकी छवि को नुकसान पहुंचा और एक तरह का मीडिया ट्रायल हुआ। लेटर में उन्होंने लिखा कि ऐसी प्रक्रिया का हिस्सा बने रहना न्याय और संस्थान-दोनों के साथ अन्याय होगा। इसलिए उन्होंने कार्यवाही से हटने और इस्तीफा देने का निर्णय लिया।
सुप्रीम कोर्ट की कमेटी ने जस्टिस वर्मा को दोषी माना
सुप्रीम कोर्ट के चीफ संजीव खन्ना ने 22 मार्च को जस्टिस वर्मा पर लगे आरोपों की इंटरनल जांच के लिए तीन सदस्यीय कमेटी बनाई थी। इसने 4 मई को CJI को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। इसमें जस्टिस वर्मा को दोषी ठहराया गया था।
जस्टिस वर्मा ने महाभियोग प्रस्ताव को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी
लोकसभा में जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था। उन्होंने इसे चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। इसमें कहा था कि दोनों सदनों में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था, लेकिन राज्यसभा ने उसे मंजूर नहीं किया। इसके बावजूद लोकसभा ने जांच समिति बना दी, जो गलत है।
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