डिजिटल भुगतान व्यवस्था में प्रस्तावित बदलाव को लेकर व्यापारियों की चिंता बढ़ गई है। 15 अक्तूबर से 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई भुगतान पर एमडीआर शुल्क लगाए जाने की बात सामने आने के बाद कारोबारियों को अपनी लागत, मुनाफे और कीमतों का नया हिसाब लगाना पड़ सकता है। कपड़ा दुकानों, सुपरमार्केट और पेट्रोल पंप जैसे कारोबारों में बड़े मूल्य के डिजिटल भुगतान का असर सीधे रोजमर्रा के खर्च पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
3,000 से 5,000 रुपये के बिल पर बढ़ेगी चिंता
कानपुर के सीसामऊ बाजार में पिछले 11 वर्षों से रेडीमेड कपड़ों का कारोबार कर रहे नवीन गुप्ता के मुताबिक, अब उनकी दुकान पर करीब 70 फीसदी भुगतान यूपीआई के जरिए होता है। त्योहारी सीजन शुरू होने वाला है और इस दौरान 3,000 से 5,000 रुपये तक के बिल आम हैं।
उनका कहना है कि अगर ऐसे भुगतानों पर अतिरिक्त शुल्क लगता है तो कारोबारियों के सामने मार्जिन कम करने या किसी दूसरे तरीके से इस लागत की भरपाई करने की चुनौती होगी। ऐसे में व्यापारियों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि डिजिटल भुगतान की सुविधा का अतिरिक्त खर्च आखिर कौन उठाएगा।
सुपरमार्केट और पेट्रोल पंप भी चिंतित
जयपुर के गांधी मार्केट में सुपर स्टोर चलाने वाले रोशनलाल के अनुसार, उनका मासिक यूपीआई लेनदेन 80 लाख रुपये से अधिक है। उनका कहना है कि बड़े भुगतानों पर अतिरिक्त लागत जुड़ने से कारोबार पर महत्वपूर्ण वित्तीय बोझ पड़ सकता है।
पेट्रोलियम कारोबार से जुड़े ब्रजकिशोर शर्मा ने भी चिंता जताई है। उनका कहना है कि पेट्रोल पंप का कारोबार बड़ा दिखाई देता है, लेकिन मुनाफा उसके अनुपात में नहीं होता। ऐसे में बड़े डिजिटल भुगतानों पर शुल्क लगने से कारोबारियों की लागत बढ़ सकती है।
त्योहारी सीजन से पहले बढ़ी चिंता
व्यापारिक संगठनों का कहना है कि यह बदलाव ऐसे समय में सामने आया है, जब त्योहारी सीजन शुरू होने वाला है और बाजार में बिक्री बढ़ने की उम्मीद रहती है। रिटेलर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के मुताबिक, त्योहारी सीजन से ठीक पहले अतिरिक्त खर्च कारोबारियों के लिए चुनौती बन सकता है।
क्लोदिंग मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने भी पहले से दबाव झेल रहे कारोबारियों के लिए इस नए खर्च को चिंता का विषय बताया है।
फिनटेक कंपनियों की भी अपनी दलील
दूसरी ओर, फिनटेक क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि डिजिटल भुगतान व्यवस्था के पीछे सर्वर, सुरक्षा, निगरानी और तकनीकी निवेश का बड़ा नेटवर्क काम करता है। उनका तर्क है कि ऐसी सेवाओं को हमेशा मुफ्त बनाए रखना मुश्किल हो सकता है।
असली सवाल सिर्फ 0.4 फीसदी एमडीआर का नहीं
पेट्रोल पंप, रिटेल, कपड़ा और उपभोक्ता वस्तुओं से जुड़े संगठनों ने अपनी चिंताएं सरकार के सामने रखना शुरू कर दिया है। कुछ उद्योग संगठनों का कहना है कि यूपीआई की लोकप्रियता का एक बड़ा कारण इसका मुफ्त होना रहा है।
फिक्की से जुड़े विशेषज्ञ चिन्ना राजशेखर के अनुसार, एमडीआर को लेकर बहस सिर्फ 0.4 फीसदी शुल्क तक सीमित नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि भारत की डिजिटल भुगतान व्यवस्था की लागत आगे किसके हिस्से आएगी—सरकार, बैंक, फिनटेक कंपनियां, व्यापारी या ग्राहक।
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