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कौन हैं चंद्रशेखरन, जिन्होंने इंटर्न के तौर पर शुरू किया सफर? टाटा समूह में ऐसे बढ़ा कद

टाटा समूह की नियंत्रक कंपनी टाटा संस में इन दिनों चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन के कार्यकाल को लेकर चर्चा है। खबर के मुताबिक, टाटा संस के बोर्ड ने चंद्रशेखरन का चेयरमैन के तौर पर कार्यकाल पांच साल और बढ़ाने पर सहमति जताई है। वहीं, टाटा ट्रस्ट्स की ओर से इस फैसले पर आपत्ति जताते हुए इसे गैरकानूनी बताया गया है। ऐसे में चंद्रशेखरन एक बार फिर सुर्खियों में हैं।

लेकिन एन. चंद्रशेखरन कौन हैं और उनका टाटा समूह तक पहुंचने का सफर कैसा रहा? आइए जानते हैं उनकी शिक्षा, शुरुआती करियर और टाटा संस के चेयरमैन बनने तक की कहानी।

साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि से आते हैं चंद्रशेखरन

नटराजन चंद्रशेखरन की शुरुआती जिंदगी तमिलनाडु के एक साधारण परिवार में बीती। उन्होंने अपने पैतृक गांव के तमिल माध्यम सरकारी स्कूल से पढ़ाई की। उनके बड़े भाइयों के बारे में भी कॉरपोरेट जगत में काम करने का उल्लेख मिलता है।

बचपन में चंद्रशेखरन और उनके भाई सरकारी स्कूल जाने के लिए रोजाना कई किलोमीटर पैदल चलते थे। बाद में चेन्नई में भी परिवार ने सादगीपूर्ण जीवन बिताया।

उनकी पत्नी का नाम ललिता चंद्रशेखरन है। दोनों की शादी को तीन दशक से अधिक समय हो चुका है और मौजूदा समय में वे मुंबई में रहते हैं।

तमिल माध्यम स्कूल से उच्च शिक्षा तक

चंद्रशेखरन ने शुरुआती शिक्षा तमिल माध्यम सरकारी स्कूल से हासिल की। इसके बाद उन्होंने कोयंबटूर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से एप्लाइड साइंसेज में स्नातक की डिग्री ली।

साल 1986 में उन्होंने तमिलनाडु के रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज, तिरुचिरापल्ली से मास्टर ऑफ कंप्यूटर एप्लीकेशंस (MCA) की डिग्री हासिल की। इस संस्थान को बाद में एनआईटी तिरुचिरापल्ली के नाम से जाना गया।

उन्हें कई संस्थानों से मानद डिग्रियां भी मिल चुकी हैं।

1986 में इंटर्न के तौर पर शुरू किया सफर

एन. चंद्रशेखरन का टाटा समूह से जुड़ाव पढ़ाई के दौरान ही हो गया था। साल 1986 में वह टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) में इंटर्न के तौर पर जुड़े थे। पढ़ाई पूरी करने के बाद 1987 में उन्होंने टीसीएस में काम शुरू किया।

शुरुआती दिनों में उन्होंने कड़ी मेहनत के साथ कंपनी में अपनी जगह बनाई। रिपोर्ट के मुताबिक, चेन्नई में काम करने के दौरान वह लंबे समय तक कार्यालय में रहते थे और सुबह जल्दी काम के लिए निकल जाते थे।

टीसीएस में बढ़ता गया कद

टीसीएस में करीब तीन दशक के करियर के दौरान चंद्रशेखरन ने कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं। आगे चलकर वह कंपनी के सीईओ बने और टाटा समूह के प्रमुख अधिकारियों में शामिल हुए।

उनके नेतृत्व के दौरान टीसीएस ने तेजी से विस्तार किया और कंपनी का कारोबारी महत्व बढ़ा। टीसीएस में उनके नेतृत्व और उपलब्धियों के बाद टाटा संस में उनकी भूमिका और महत्वपूर्ण होती गई।

2017 में बने टाटा संस के चेयरमैन

साइरस मिस्त्री को टाटा संस के चेयरमैन पद से हटाए जाने के बाद समूह में नेतृत्व को लेकर बदलाव का दौर शुरू हुआ। अक्टूबर 2016 में चंद्रशेखरन को टाटा संस के बोर्ड में शामिल किया गया।

जनवरी 2017 में उन्हें टाटा संस का कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया गया और 21 फरवरी 2017 को उन्होंने आधिकारिक तौर पर पद संभाला। इस तरह वह टाटा समूह के 150 से अधिक वर्षों के इतिहास में पहले पेशेवर और गैर-पारसी चेयरमैन बने।

उस समय रतन टाटा ने अंतरिम अध्यक्ष की भूमिका संभाली थी।

‘वन टाटा’ रणनीति पर जोर

चेयरमैन के तौर पर चंद्रशेखरन के कार्यकाल में टाटा समूह के अलग-अलग कारोबारों को अधिक एकीकृत तरीके से आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया। इसी संदर्भ में ‘वन टाटा’ की रणनीति को प्रमुखता मिली।

उनके नेतृत्व में समूह के कारोबारों में पुनर्गठन, विलय और गैर-प्रमुख संपत्तियों से बाहर निकलने जैसे कदम भी उठाए गए।

एयर इंडिया से लेकर सेमीकंडक्टर तक

चंद्रशेखरन के कार्यकाल में टाटा समूह ने कई नए क्षेत्रों में विस्तार किया। सरकार से एयर इंडिया का अधिग्रहण कर उसे टाटा समूह में वापस लाना इस दौर का एक प्रमुख घटनाक्रम रहा।

इसके अलावा टाटा समूह ने सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, विमान निर्माण और बैटरी निर्माण जैसे क्षेत्रों में भी योजनाएं आगे बढ़ाईं।

टाटा समूह के डिजिटल कारोबार को एक मंच पर लाने के उद्देश्य से टाटा न्यू सुपरऐप भी लॉन्च किया गया।

चेयरमैन पद को लेकर अब क्यों चर्चा?

चंद्रशेखरन का मौजूदा कार्यकाल फरवरी 2027 में समाप्त होना था। कॉपी के अनुसार, अगस्त में उन्होंने कहा था कि कार्यकाल पूरा होने के बाद वह पुनर्नियुक्ति की मांग नहीं करेंगे और बोर्ड से उत्तराधिकारी चुनने को कहा था।

हालांकि, 17 सितंबर 2026 को टाटा संस के बोर्ड ने उनके चेयरमैन पद पर एक और कार्यकाल के लिए पुनर्नियुक्ति को मंजूरी दे दी। इसके बाद टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा की ओर से इस फैसले पर आपत्ति जताई गई और पुनर्नियुक्ति को अवैध बताया गया।

इस घटनाक्रम ने टाटा संस के नेतृत्व और कॉरपोरेट गवर्नेंस को लेकर चर्चा तेज कर दी है।

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