दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) चुनाव भले ही विश्वविद्यालय परिसर तक सीमित रहते हों, लेकिन इनका प्रभाव दिल्ली की राजनीति से लेकर राष्ट्रीय राजनीति तक दिखाई देता रहा है। वर्ष 1954 में शुरू हुए डूसू चुनाव ने पिछले सात दशकों में अलग-अलग विचारधाराओं से जुड़े छात्र नेताओं को राजनीतिक मंच दिया है।
डूसू से निकले कई छात्र नेताओं ने आगे चलकर पार्षद, विधायक, सांसद, केंद्रीय मंत्री और मुख्यमंत्री तक का सफर तय किया। यही वजह है कि डूसू को दिल्ली और राष्ट्रीय राजनीति के लिए नेतृत्व तैयार करने वाली प्रयोगशाला भी कहा जाता है।
डूसू से दिल्ली के मुख्यमंत्री पद तक पहुंचीं रेखा गुप्ता
डूसू की छात्र राजनीति से निकली प्रमुख नेताओं में दिल्ली की मौजूदा मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता का नाम भी शामिल है। वह पहले डूसू की सचिव रहीं और बाद में वर्ष 1996-97 में अध्यक्ष बनीं।
छात्र राजनीति के बाद उन्होंने नगर निगम की राजनीति में कदम रखा और तीन बार पार्षद रहीं। वर्ष 2025 में शालीमार बाग से विधायक चुने जाने के बाद वह दिल्ली की मुख्यमंत्री बनीं। डूसू के इतिहास में यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जाती है।
दिल्ली सरकार के शिक्षा मंत्री आशीष सूद भी वर्ष 1988-89 में डूसू अध्यक्ष रह चुके हैं।
अरुण जेटली से विजय गोयल तक
डूसू ने ऐसे कई नेताओं को राजनीतिक मंच दिया, जिन्होंने आगे चलकर राष्ट्रीय राजनीति में अहम जिम्मेदारियां संभालीं। वर्ष 1974 में एबीवीपी के टिकट पर डूसू अध्यक्ष बने अरुण जेटली बाद में राज्यसभा सांसद और केंद्रीय मंत्री बने।
वर्ष 1986 में डूसू अध्यक्ष रहे अजय माकन ने भी राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और केंद्र सरकार में मंत्री रहे। वर्ष 1978 में अध्यक्ष रहे विजय गोयल तीन बार लोकसभा और एक बार राज्यसभा के सदस्य रहे। उन्होंने केंद्र सरकार में मंत्री की जिम्मेदारी भी संभाली।
कांग्रेस की राजनीति में भी डूसू की छाप
डूसू से निकलने वाले नेताओं में कांग्रेस से जुड़े कई नाम भी हैं। अजय माकन के अलावा सुभाष चोपड़ा, अलका लांबा, नीतू वर्मा और अमृता धवन ने छात्र राजनीति से अपने सियासी सफर की शुरुआत की।
नीतू वर्मा और अमृता धवन बाद में पार्षद बनीं। अनिल चौधरी विधानसभा पहुंचे, जबकि अनिल झा, विजय जौली और अलका लांबा ने भी छात्र राजनीति के बाद सक्रिय राजनीति में अपनी जगह बनाई।
क्यों महत्वपूर्ण है डूसू चुनाव?
डूसू चुनाव सिर्फ विश्वविद्यालय के छात्र प्रतिनिधियों के चुनाव तक सीमित नहीं हैं। यहां छात्र नेता संगठन चलाने, चुनाव प्रचार करने, मुद्दे उठाने और सार्वजनिक मंच पर अपनी बात रखने का अनुभव हासिल करते हैं।
इसी वजह से पिछले कई दशकों में डूसू से निकले नेताओं ने दिल्ली और देश की राजनीति में अपनी पहचान बनाई है। यही राजनीतिक विरासत डूसू चुनाव को देश के सबसे चर्चित छात्रसंघ चुनावों में शामिल करती है
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