Wednesday , September 2 2026

डूसू चुनाव में अब पहले जैसा रौनक नहीं: 17 साल में बदली छात्र राजनीति की तस्वीर, धनबल-बाहुबल पर अंकुश

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (डूसू) चुनाव का रंग-रूप पिछले 17-18 वर्षों में काफी बदल गया है। कभी डूसू चुनाव में भारी भीड़, वाहनों के काफिले और बड़े पैमाने पर प्रचार देखने को मिलता था, लेकिन अब पहले जैसी रौनक नजर नहीं आती। धनबल और बाहुबल पर सख्ती के साथ चुनाव प्रचार का तरीका भी बदल गया है।

कभी विधानसभा चुनाव जैसा दिखता था असर

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव की शुरुआत 1955 में हुई थी। करीब दो दशक पहले तक डूसू चुनाव की भव्यता इतनी ज्यादा थी कि इसकी तुलना नगर निगम और विधानसभा चुनावों से तक की जाती थी।

छात्र नेताओं के प्रचार में बड़ी संख्या में समर्थक, वाहनों के काफिले और बड़े स्तर पर प्रचार अभियान दिखाई देते थे। धीरे-धीरे डूसू चुनाव का असर विश्वविद्यालय से बाहर तक बढ़ा और इसकी चर्चा राष्ट्रीय राजनीति में भी होने लगी।

लिंगदोह कमेटी के नियमों से बदला प्रचार

पिछले कुछ वर्षों में चुनाव प्रचार को लेकर नियम लगातार सख्त हुए हैं। लिंगदोह कमेटी के दिशा-निर्देश, पांच हजार रुपये की चुनावी खर्च सीमा और प्रचार पर लगी पाबंदियों ने चुनाव का तरीका बदल दिया है।

डीयू प्रशासन ने भी चुनाव आचार संहिता के तहत छात्र संगठनों और उम्मीदवारों पर निगरानी बढ़ाई है। प्रचार के दौरान लग्जरी गाड़ियों की एंट्री पर रोक लगाई गई है और नियमों का उल्लंघन करने वाले वाहनों के चालान भी किए जा रहे हैं।

सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पर सख्ती

डूसू चुनाव के दौरान प्रचार के नाम पर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के मामले भी सामने आते रहे हैं। वर्ष 2024 में स्थिति इतनी गंभीर हुई थी कि अदालत ने मतगणना पर रोक लगा दी थी।

पिछले अनुभवों को देखते हुए डीयू प्रशासन और पुलिस ने चुनाव के दौरान सख्ती बढ़ाई है। इसका असर चुनाव प्रचार और उम्मीदवारों की गतिविधियों पर साफ दिखाई दे रहा है।

1974 में शुरू हुआ था प्रत्यक्ष चुनाव

डूसू चुनाव के इतिहास में वर्ष 1974 को अहम मोड़ माना जाता है। इसी साल प्रत्यक्ष चुनाव की शुरुआत हुई। इसके बाद कॉलेज प्रतिनिधियों के बजाय विश्वविद्यालय के छात्रों ने सीधे मतदान कर छात्रसंघ पदाधिकारियों को चुनना शुरू किया।

प्रत्यक्ष चुनाव के तहत डूसू के पहले अध्यक्ष आलोक कुमार बने, जो एबीवीपी से जुड़े छात्र नेता थे। इसके बाद डूसू चुनाव धीरे-धीरे छात्र राजनीति से निकलकर बड़े राजनीतिक प्रभाव वाले चुनाव में बदलता गया।

अब नियमों के बीच तलाश रहा पुरानी पहचान

इस साल भी डूसू चुनाव का बिगुल बज चुका है, लेकिन चुनाव प्रचार में पहले जैसी तड़क-भड़क और शक्ति प्रदर्शन नजर नहीं आ रहा है। सख्त नियमों और प्रशासन की निगरानी के बीच छात्र संगठन प्रचार कर रहे हैं।

यानी 17-18 वर्षों में डूसू चुनाव की तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। कभी जिस चुनाव में धनबल, बाहुबल और बड़े शक्ति प्रदर्शन की चर्चा होती थी, अब वही चुनाव सीमित खर्च और सख्त नियमों के बीच हो रहा है।

Check Also

अगस्त में छात्र आंदोलनों ने खींचा ध्यान, दीक्षांत समारोह से मानसिक स्वास्थ्य तक क्या रहे मुद्दे?

अगस्त 2026 में देश के कई बड़े उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों ने अलग-अलग मुद्दों ...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *